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डायरी

भोजन करने के पश्चात आज भी वो छत पर गया और टहल रहा था, लेकिन आज उसका दिल बेतहासा धड़क रहा था, दो मिनट के बाद सहसा फ़ोन की ओर निहारने लगा ,अंधेरी रात में फ़ोन के स्क्रीन के प्रकाश में उसकी आँखे दिख रही थी जो आँसुओ से भरी थी और वो ऐसा कोशिश कर रहा था मानो आंसू आंख से गिरने न पाए, अब पवन ने भी मन्द मन्द मुस्कुराना शुरू किया और ऊपर बिजली तड़क रही थी ,हल्की हल्की बारिश भी आनी शुरू हो गयी लेकिन अभी भी कुछ पसीने की बून्द उसके माथे पर साफ झलक रही थी , वह सकरात्मक सोचने का प्रयास कर रहा था,वह शांत दिखना चाह रहा था लेकिन वो अंदर से बेचैन हो रहा था, उसने जल्दी से सीढियो की तरफ कदम बढ़ाये और नीचे अपने कमरे में आकर लाइट बन्द करके लेट गया और फिर करीब दो घण्टे वो चौक कर उठा और लाइट ऑन की और कॉपी कलम लेकर बैठ जाता है और लिखता है- सुनो न ,तुम रोज मेरे सपने में आती हो और मेरा नाम पुकारती हो ,मैं रोज़ इस का इंतेज़ार करता हूँ और तुम्हारी आवाज़ सुनकर दौड कर जाता हूँ और तम्हे गले से लगा लेता हूं और उसके बाद मैं तुम्हारे पास बैठकर तुम्हारे आंखों को निहारता हूँ और महसूस करता हूं की इश्वर ने तुम्हे सिर्फ मेरे लिये ...

मन की डोर

तन की सौ सौ बन्दिशें मन को लगी ना रोक तन की दो गज कोठरी मन के तीनों लोक, ये भी बड़ी अजीब है जहां बंध जाए, वहां गुण खोजता है। जहां से उखड़ जाए, उसी के गुण फिर उसको खटकते हैं! तब वो चाहता है कहीं जाके मन की वो परख ही फेक आए, जो गुणों को पहचानती है, कोई कहता है वाह आप बहुत सुंदर लगते है?  "नाइस पिक डिअर "  कोई कहता है आपका चेहरा गोल है , थोड़ा यू रहता तो ठीक रहता, फिर कोई कह बैठा, तुम्हारी आवाज़ में जैसे एक गूंज है, मौन है! तुम कुछ बोलते क्यों नहीं, स्वयं को छिपाते क्यों हो?कोई कह बैठता है की आपका नाम ऐसा है इसको निकष बनाइये,और यकीन मानिए ,कही न कही ये बाते प्रभाव दिखाती है, और हम खुद को और सामने वाले को इनसब के आधार पर जज करने लगते है, जब दु:ख में हो तो ये मन अचल हो जाता है। दु:ख शब्दों में मौन भर देता है। मौन मन को बड़े विकल रूप से सुंदर बनाता है। जब सुख में हो तो हुलसता है। तपाक से बढ़ता है। औरों तक चलकर जाता है। मेले में मिल गए विद्वेषी से हाथ मिला आता है। फिर एकान्त में ख़ुद को कोसता है कि मैं भी कैसा अधीर हूँ,, ये मन ने ऐसा कुछ कर दिया था की तारीफ से घृणा होने लगी थी , मन में...

एकल दिया या दिउ दीप

जल दीप उठा सारे जग में,स्वर गूंज उठा मन के उपवन में, बोझ लिए विकराल धरा का,गरज उठा मानो नभ तन्मय में , रिक्त किया भावों को चित्त से , प्रेमाश्रु से सिंचित तन में, रोम_रोम खिल उठा देह का, पर दीप्ति बना रहा बंद नयन में जो एक दीप के खातिर,रिक्त रहा जीवन ये चिंतित, प्रेमकली को पुष्प बनाने , क्षितिज को किया आमंत्रित, ज्योतिरहित उन कोठरियों ने,तम को मधु से किया सुसज्जित प्रेमनिधि में बहकर उसने, शुभ नाम पटल पर किया अंकित सहसा स्मरण हुआ , घोर निशा की उन कल्पनाओं का  इष्ट भी विस्मृत हुआ , जब स्मृति को पाया प्रार्थनाओं में, अनुरोध हुआ ,विरोध हुआ , क्रोध हुआ आगंतुको में, तब मोह हटा, धागा टूटा, फिर ज्ञात हुआ मन तरंगों को कल पवन न था , न एक जले , आज दिउ जले पर हार हुआ, पावन हृदय की पोटली न थी, पर कोमल हृदय पाषाण हुआ,

हाँ मैं लिखता हूं

मैं अपनी धुन में आगे बढ़ता हूं   क्योंकि मैं हर खमोशी को मैं पढ़ता हूं, मैं लिखता हूँ,  जिस भाव को तुम पढ़ न सकते ,  अब उस भाव को मैं शब्द का रूप देता हूं  जिस शब्द को तुम गढ़ न सकते,   मैं उसका सृंगार करता हूं   हा मैं लिखता हूं,,  तभी तो हर तरफ तालियों में गूँजता हूं , अपनी एक अलग काल्पनिक दुनिया मे जीता हूँ,  किसी का जीवन का आशा तो किसी के लिए प्रेणना बनता हूं ,  तो किसी के जीवन का मान और सम्मान तो किसी के विजय का ताज बनता हूं,  हा मैं लिखता हूं,  अपने जीत के साथ साथ हार को भी पढ़ने का साहस रखता हूं पूरी तरह न समझ सकोगे, आधी-अधूरी अगर छोड़ दोगे, क्योंकि अतीत के दर्द को भी नए रूप में रचता हूं, तभी तो कुछ के लिए मात्र एक पहेली बनकर रह जाता हूं हा मैं लिखता हूं,, मुझे भी शौक नही है यू ही कलम के नोक को आंसुओ से भिगोने की , लेकिन फिर भी मैं लिखता हूं क्योंकि मुझे हृदय की धरातल में कल्पना के उपज उगाने में सुकून मिलता है हा मैं लिखता हूं  

बुद्धिमान कौन

"अगर दुश्मन को खत्म करना है तो उसकी तारीफ करना शुरू कर दो, तारीफ के वो शब्द उसके अंदर निश्चित तौर पर अहंकार पैदा कर देंगे और वही अहंकार उसके ज्ञान का नाश कर देगा" यही कोई मेरी उम्र पांच वर्ष से भी कम रही होगी , उस उम्र में ही मेरे चर्चे दूर दूर तक होने लगे थे और कारण था मेरे उस छोटी सी उम्र में ही मेरे अंदर की असाधारण (एक्स्ट्राआर्डिनरी)  बाते, चाहे वो शिक्षा के मामले में हो या संस्कार के, घर के बडा लड़का होने के कारण सब कोई मेरे ऊपर ध्यान देता था, स्कूल से लेकर ,गांव, रिश्तेदारी , जिधर देखो अरे "फलाना के लड़का" बहुत तेज ब  पढ़े में ....  और मैं भी बहुत खुश होता था और उसी समय मुझे लगने लगा कि हा मैं सच मे बहुत बुद्धिमान हूं और मेरे अंदर भी अब तारीफ की भूख बढ़ गई थी और ऐसा सामन्यतः होता भी है,  जब कोई पूछता तो 'बाबू आगे क्या बनोगे"  मैं तो मानो इस सवाल के लिए पहले से ही तैयार रहता था, गर्व से दुनिया की सबसे बड़ी चीज जो मुझे लगती थी ,वही बोल देता था,😀 उस समय जब कोई पिता अपने लड़के को समझाता था तो मेरा उदाहरणस्वरूप मेरा मेरा नाम लेता था, लेकिन गांव - देहात में लोग ...

दृश्य का चित्रण-

नौंवी कक्षा का दृश्य  क्लास में पंखा अपनी चरम अवस्था मे चल रहा था , सभी विद्यार्थी श्यामपट्ट पर देख रहे थे, एक शिक्षिका कुछ पढ़ा रही थी। चारो तरफ सन्नाटा होता है , तभी अचानक से एक आवाज़ आती है ",may i comein maam". सब कोई का ध्यान अचानक दरवाजे पर जाता है ,  दरवाजे पर एक मासूम लड़का पीठ पर बैग टांगे हुए सावधान की मुद्रा में खड़ा था। 'Yes come in '', मैडम जी सामान्यतः जबाब देती है , लड़का तमाम ख्याल लिए हुए संकोच की भाव लिए हुए धीरे धीरे अंदर जाता है , न जाने कितने प्रश्न उसके खण्डहर रूपी दिमाग मे चल रहे होते है ,   लड़का धीरे से पूछता है , maam , ये क्लास 9th kestral है ?? Yes , मैडम जी जबाब देती है ,  तभी mam को व्यस्त देखकर विद्यार्थि, अपने आप मे बात करने लगते है , तभी mam के एक आवाज़ देने के बाद सभी शांत होकर लड़के को देखने लगते है , लड़का यही कोई छठवी या सातवी क्लास में पढ़ने वाला प्रतीक होता था । "क्या काम है बच्चा तुम्हे , किससे मिलना है तुम्हे ,???  लड़का चुकी 9th में पढ़ने आया होता है ,  लेकिन ऐसा सवाल सुनकर स्तब्ध सा जाता है , कक्षा में कन्याये भी उप...