मन की डोर

तन की सौ सौ बन्दिशें
मन को लगी ना रोक
तन की दो गज कोठरी
मन के तीनों लोक,
ये भी बड़ी अजीब है जहां बंध जाए, वहां गुण खोजता है। जहां से उखड़ जाए, उसी के गुण फिर उसको खटकते हैं! तब वो चाहता है कहीं जाके मन की वो परख ही फेक आए, जो गुणों को पहचानती है,
कोई कहता है वाह आप बहुत सुंदर लगते है? 
"नाइस पिक डिअर " 
कोई कहता है आपका चेहरा गोल है , थोड़ा यू रहता तो ठीक रहता,
फिर कोई कह बैठा, तुम्हारी आवाज़ में जैसे एक गूंज है, मौन है! तुम कुछ बोलते क्यों नहीं, स्वयं को छिपाते क्यों हो?कोई कह बैठता है की आपका नाम ऐसा है इसको निकष बनाइये,और यकीन मानिए ,कही न कही ये बाते प्रभाव दिखाती है,
और हम खुद को और सामने वाले को इनसब के आधार पर जज करने लगते है,
जब दु:ख में हो तो ये मन अचल हो जाता है। दु:ख शब्दों में मौन भर देता है। मौन मन को बड़े विकल रूप से सुंदर बनाता है। जब सुख में हो तो हुलसता है। तपाक से बढ़ता है। औरों तक चलकर जाता है। मेले में मिल गए विद्वेषी से हाथ मिला आता है। फिर एकान्त में ख़ुद को कोसता है कि मैं भी कैसा अधीर हूँ,,
ये मन ने ऐसा कुछ कर दिया था की तारीफ से घृणा होने लगी थी , मन में नकारत्मकता के सिवा कुछ न था ,
और अब भी शायद कुछ अंश बचा है लेकिन अब फर्क नही पड़ता कौन क्या कहता है ।