हाँ मैं लिखता हूं
मैं अपनी धुन में आगे बढ़ता हूं
क्योंकि मैं हर खमोशी को मैं पढ़ता हूं,
मैं लिखता हूँ,
जिस भाव को तुम पढ़ न सकते ,
अब उस भाव को मैं शब्द का रूप देता हूं
जिस शब्द को तुम गढ़ न सकते,
मैं उसका सृंगार करता हूं
हा मैं लिखता हूं,,
तभी तो हर तरफ तालियों में गूँजता हूं ,
अपनी एक अलग काल्पनिक दुनिया मे जीता हूँ,
किसी का जीवन का आशा तो किसी के लिए प्रेणना बनता हूं ,
तो किसी के जीवन का मान और सम्मान तो किसी के विजय का ताज बनता हूं,
हा मैं लिखता हूं,
अपने जीत के साथ साथ हार को भी पढ़ने का साहस रखता हूं
पूरी तरह न समझ सकोगे,
आधी-अधूरी अगर छोड़ दोगे,
क्योंकि अतीत के दर्द को भी नए रूप में रचता हूं,
तभी तो कुछ के लिए मात्र एक पहेली बनकर रह जाता हूं
हा मैं लिखता हूं,,
मुझे भी शौक नही है यू ही कलम के नोक को आंसुओ से भिगोने की ,
लेकिन फिर भी मैं लिखता हूं क्योंकि मुझे हृदय की धरातल में कल्पना के उपज उगाने में सुकून मिलता है
हा मैं लिखता हूं