एकल दिया या दिउ दीप

जल दीप उठा सारे जग में,स्वर गूंज उठा मन के उपवन में,

बोझ लिए विकराल धरा का,गरज उठा मानो नभ तन्मय में ,

रिक्त किया भावों को चित्त से , प्रेमाश्रु से सिंचित तन में,

रोम_रोम खिल उठा देह का, पर दीप्ति बना रहा बंद नयन में



जो एक दीप के खातिर,रिक्त रहा जीवन ये चिंतित,

प्रेमकली को पुष्प बनाने , क्षितिज को किया आमंत्रित,

ज्योतिरहित उन कोठरियों ने,तम को मधु से किया सुसज्जित

प्रेमनिधि में बहकर उसने, शुभ नाम पटल पर किया अंकित



सहसा स्मरण हुआ , घोर निशा की उन कल्पनाओं का 

इष्ट भी विस्मृत हुआ , जब स्मृति को पाया प्रार्थनाओं में,

अनुरोध हुआ ,विरोध हुआ , क्रोध हुआ आगंतुको में,

तब मोह हटा, धागा टूटा, फिर ज्ञात हुआ मन तरंगों को

कल पवन न था , न एक जले , आज दिउ जले पर हार हुआ,

पावन हृदय की पोटली न थी, पर कोमल हृदय पाषाण हुआ,